विकास भवन में ‘वसूली का खेल’! MLA निधि के काम के नाम पर कथित सौदेबाजी का वीडियो वायरल, अधिकारी के नाम पर पैसे मांगने का आरोप परियोजना निदेशक की तहरीर पर वरिष्ठ सहायक अर्जुन कुमार गौतम पर मुकदमा—वीडियो ने खोली सरकारी दफ्तरों की ‘कथित सेटिंग’ की परतें, अब जांच में खुलेंगे राज

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विकास भवन में ‘वसूली का खेल’! MLA निधि के काम के नाम पर कथित सौदेबाजी का वीडियो वायरल, अधिकारी के नाम पर पैसे मांगने का आरोप

परियोजना निदेशक की तहरीर पर वरिष्ठ सहायक अर्जुन कुमार गौतम पर मुकदमा—वीडियो ने खोली सरकारी दफ्तरों की ‘कथित सेटिंग’ की परतें, अब जांच में खुलेंगे राज
आनंद पब्लिक, महराजगंज
(क्राईम रिपोर्टर सोनू पांडेय)
महराजगंज। विकास भवन में विकास योजनाओं की फाइलें चलती हैं या फिर कथित तौर पर ‘रेट तय’ होने के बाद काम आगे बढ़ता है? सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो ने जिले के महत्वपूर्ण सरकारी कार्यालय की कार्यप्रणाली पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। विधायक निधि के काम के नाम पर कथित लेनदेन की बातचीत और अधिकारियों के नाम पर कथित रूप से पैसे मांगने के आरोप ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया है।
मामले में परियोजना निदेशक रामदरश चौधरी की तहरीर पर विकास भवन के वरिष्ठ सहायक अर्जुन कुमार गौतम के खिलाफ पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है। वीडियो वायरल होने के बाद सरकारी तंत्र में भी इस प्रकरण को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
फाइल सरकारी, ‘रेट’ कथित तौर पर निजी?
वायरल वीडियो में कथित तौर पर पैसे के लेनदेन को लेकर बातचीत होने का दावा किया जा रहा है। मामला विधायक निधि से जुड़े कार्य से जोड़ा जा रहा है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी सरकारी कार्य को आगे बढ़ाने के नाम पर पैसे की मांग की जा रही थी तो पैसे किसके लिए मांगे जा रहे थे और किसके निर्देश पर?
हालांकि वायरल वीडियो की सत्यता, आवाज और बातचीत के पूरे संदर्भ की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी, लेकिन वीडियो के सामने आने से विकास भवन की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल जरूर खड़े हो गए हैं।
अधिकारी का नाम लेकर ‘वसूली’—कौन है असली खिलाड़ी?
यदि जांच में अधिकारी के नाम पर पैसे मांगने का आरोप सही पाया जाता है तो मामला और गंभीर हो सकता है। क्योंकि सवाल केवल कथित रूप से पैसे मांगने वाले व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस पूरे तंत्र का है जिसमें किसी अधिकारी का नाम इस्तेमाल करके सरकारी काम के बदले कथित रकम मांगी जाती है।
क्या संबंधित अधिकारी को इसकी जानकारी थी?
क्या किसी ने अधिकारी का नाम अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया?
क्या इससे पहले भी ऐसे मामले हुए हैं?
इन सवालों के जवाब पुलिस जांच में तलाशे जाने जरूरी हैं।
मुकदमा दर्ज, लेकिन ‘बड़े सवाल’ अभी बाकी
मुकदमा दर्ज होना कार्रवाई की शुरुआत है, अंत नहीं। अब पुलिस को वायरल वीडियो की फोरेंसिक जांच, बातचीत के स्रोत, संबंधित मोबाइल/डिजिटल साक्ष्य, विधायक निधि के संबंधित कार्य की पत्रावली और कथित लेनदेन से जुड़े तथ्यों की जांच करनी होगी।
साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि कथित रकम की मांग किसके नाम पर, किस काम के लिए और किस स्तर पर की गई थी।
विकास भवन पर उठे 7 सीधे सवाल
1. विधायक निधि के काम के नाम पर कथित पैसे की मांग किसने की?
2. अधिकारियों के नाम का इस्तेमाल क्यों और किस उद्देश्य से किया गया?
3. वायरल वीडियो में दिखाई/सुनाई दे रही बातचीत की सत्यता क्या है?
4. क्या कथित वसूली का कोई पुराना रिकॉर्ड या शिकायत भी सामने आती है?
5. क्या इस मामले में वरिष्ठ सहायक के अलावा किसी अन्य की भूमिका है?
6. संबंधित विधायक निधि के काम की पूरी पत्रावली की जांच होगी या नहीं?
7. यदि आरोप सही निकले तो क्या केवल कर्मचारी पर कार्रवाई होगी या जिम्मेदारी ऊपर तक तय होगी?
**सवाल सिर्फ एक कर्मचारी का नहीं, व्यवस्था की विश्वसनीयता का है
सरकारी कार्यालय जनता के काम के लिए हैं, कथित वसूली के अड्डे बनने के लिए नहीं। अगर वायरल वीडियो और लगाए गए आरोप जांच में सही साबित होते हैं तो यह बेहद गंभीर प्रशासनिक मामला होगा। वहीं अगर आरोप गलत पाए जाते हैं तो इसकी सच्चाई भी जांच के जरिए सार्वजनिक होनी चाहिए।
अब निगाहें पुलिस जांच पर हैं। मुकदमा दर्ज हो चुका है, लेकिन जनता यह जानना चाहती है कि कथित ‘वसूली की रकम’ का रास्ता आखिर कहां तक जाता था और इसके पीछे कौन-कौन लोग थे?

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