CAA विरोधी प्रस्ताव को लेकर बैकफुट पर आई यूरोपियन संसद, आज कराएगी बहस


 

यूरोपियन संसद (European Parliament) के सत्र की शुरूआत भारतीय समयानुसार आज रात 10:45 बजे से होगी. यह सत्र गुरुवार सुबह साढ़े तीन बजे तक चलेगा. पूर्ण सत्र में उठाए जाने वाले पांच मुद्दों में से दूसरे नंबर पर सीएए (CAA) का मुद्दा उठाया जाएगा.

नई दिल्ली. यूरोपियन यूनियन फॉर फॉरेन अफेयर्स के उच्च प्रतिनिधि जोसेफ बोरेल के 'रायसीना डायलॉग' (Raisena Dialogue) कार्यक्रम के लिए भारत दौरे के दो हफ्ते बाद, यूरोपीय संसद भारत के नागरिकता संशोधन अधिनियम (Citizenship Amendment Act) के खिलाफ जारी हुए प्रस्ताव पर बहस और मतदान करेगी.
यूरोपियन संसद के सत्र की शुरूआत भारतीय समयानुसार आज रात 10:45 बजे से होगी. यह सत्र गुरुवार सुबह साढ़े तीन बजे तक चलेगा. पूर्ण सत्र में उठाए जाने वाले पांच मुद्दों में से दूसरे नंबर पर सीएए का मुद्दा उठाया जाएगा. इस प्रस्ताव पर गुरुवार शाम 4 बजे से 6 बजे तक वोटिंग होगी. सीएए प्रस्ताव पर वोटिंग एजेंडा में सबसे आखिरी नंबर पर है.

इस अंतिम प्रस्ताव के ड्राफ्ट में जिसमें कई पक्षों के पिछले छह संकल्पों को जोड़ा गया है, इसके मुताबिक "सीएए को अपनाने और कार्यान्वयन पर गहरा खेद है, जो प्रकृति में भेदभावपूर्ण और खतरनाक रूप से विभाजनकारी है." यह प्रस्ताव भारत सरकार से नागरिकों की याचिकाओं पर ध्यान देने के लिए कहता है और यह सीएए (CAA) और नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) के बीच बिंदुओं को जोड़ने की भी बात करता है.

उदाहरण में लिया गया यूपी का नाम
प्रस्ताव के लिए संयुक्त प्रस्ताव का मसौदे में कहा गया है कि "शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों" पर "क्रूर कार्रवाई" हुई है और उदाहरण के रूप में भाजपा शासित उत्तर प्रदेश का नाम दिया गया है. इसमें कहा गया है- "उत्तर प्रदेश में, विशेष रूप से सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को पीटने, गोली मारने और यातना देने की खबरों के अलावा शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए भारतीय अधिकारियों ने ने इंटरनेट बंद करने, कर्फ्यू और सार्वजनिक वाहनों पर रोक लगाई गई."

सरकार ने इन घटनाक्रमों पर अपनी नाराजगी व्यक्त की और भारत में यूरोपीय संघ के राजदूत, उगो एस्टुटो को विदेश मंत्रालय ने समन जारी किया. सरकारी सूत्रों ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि प्रस्तावों के प्रायोजक और समर्थक आगे बढ़ने से पहले तथ्यों का पूर्ण और सटीक मूल्यांकन प्राप्त करने के लिए भारत के साथ संपर्क करेंगे.

पीएम मोदी करने वाले हैं यूरोप की यात्रा
यूरोपीय संघ के प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि "यूरोपीय संसद एक स्वतंत्र संस्था है, जो अपने काम के संगठन और अपने विचार-विमर्श में संप्रभु है." लेकिन इसके बाद ब्रसेल्स के यूरोपीय संघ के एक अधिकारी ने एक और बयान जारी किया, "यूरोपीय संसद और इसके सदस्यों द्वारा व्यक्त की गई राय यूरोपीय संघ की आधिकारिक स्थिति का प्रतिनिधित्व नहीं करती है."

प्रस्ताव से दूरी बनाने के लिए आधिकारिक स्थिति को स्पष्ट करते हुए जारी किया गया संशोधित बयान भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन के लिए मार्च में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ब्रसेल्स की आगामी यात्रा को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है. बयान में कहा गया है कि शिखर सम्मेलन "भारत के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने" की दृष्टि से था. यूरोपीय ब्लॉक भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है.

मानवाधिकार के मुद्दे पर आवाज उठाती है यूरोपियन संसद
राजनयिक सूत्रों ने यह भी बताया कि विदेश नीति से जुड़े मुद्दे ज्यादातर सदस्य देशों के अलग-अलग हैं और यूरोपीय संसद की राय या प्रस्ताव निश्चित रूप से बाध्यकारी नहीं है.सूत्रों ने कहा कि प्रत्येक यूरोपीय संघ के सदस्य राज्य की अपनी स्वतंत्र विदेश नीति है, और कई लोग किसी अन्य देश के आंतरिक मुद्दों पर टिप्पणी करने के लिए मंजूरी नहीं देते हैं.

लेकिन यूरोपीय संसद स्पष्ट रूप से कहती है कि यह "यह नहीं मानता है कि लोगों के मूल अधिकार यूरोपीय संघ की सीमाओं पर समाप्त होते हैं. यूरोपीय संसद के सदस्य नियमित रूप से गैर-यूरोपीय संघ के देशों में मानवाधिकार के मुद्दों के बारे में व्यक्तिगत रूप से या एक साथ बोलते हैं क्योंकि ये अधिकार सार्वभौमिक माने जाते हैं."

ओम बिरला ने लिखी चिट्ठी
यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र के कन्वेंशन ऑफ स्टेटलेस पर्सन्स, यूरोपीय संघ के मानवाधिकार रक्षकों के दिशानिर्देशों और संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों द्वारा बयान के आधार पर बनाया गया है, जिसमें भारत और असम के लाखों लोगों के लिए स्टेटलेसनेस और अस्थिरता के जोखिम पर बयान दिया गया है जिसमें कई लोगों के बयान भी शामिल हैं।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सोमवार को इस प्रस्ताव को लेकर यूरोपीय संसद के अध्यक्ष डेविड मारिया सासोली को लिखा कि एक विधायिका के लिए दूसरे पर निर्णय पारित करना अनुचित है और निहित स्वार्थों से इस प्रथा का दुरुपयोग किया जा सकता है. उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने भी भारत के रुख को दोहराते हुए कहा था कि देश के आंतरिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप की कोई गुंजाइश नहीं है।

रिपोर्ट करुणेश पांडेय