राजनीतिक दलों को SC का आदेश- उम्मीदवारों का क्रिमिनल रिकॉर्ड वेबसाइट पर डालना होगा, बताना होगा क्यों दिया टिकट


 

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने राजनीतिक दलों को आदेश दिया है कि सभी उम्मीदवारों के क्रिमिनल रिकॉर्ड वेबसाइट पर अपलोड किए जाएं. कोर्ट ने आगाह किया कि अगर इस आदेश का पालन नहीं किया गया तो अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है.

नई दिल्ली. राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण के खिलाफ दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का फैसला आ चुका है. कोर्ट ने सभी राजनीतिक दलों से दागी उम्मीदवारों को चुनाव का टिकट दिए जाने की वजह बताने का आदेश दिया है. जस्टिस रोहिंटन नरीमन और एस रविंद्र भट की बेंच ने इसके साथ ही कहा कि सभी पार्टियों को अपने उम्मीदवारों का क्रिमिनल रिकॉर्ड आधिकारिक फेसबुक और ट्विटर हैंडल पर अपलोड करना होगा. शीर्ष अदालत ने आगाह किया कि अगर इस आदेश का पालन नहीं किया गया तो अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है.
कई याचिकाकर्ताओं में से बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि कोर्ट चुनाव आयोग को निर्देश दे कि वह राजनीतिक दलों पर दबाव डाले कि राजनीतिक दल आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं को टिकट न दें. ऐसा होने पर आयोग राजनीतिक दलों के खिलाफ कार्रवाई करे. इस पर फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने सवाल किया कि आखिर पार्टियों की ऐसी क्या मजबूरी है कि वह आपराधिक पृष्ठभूमि वाले प्रत्याशी को टिकट देती हैं.
कोर्ट ने कहा, 'अगर राजनीतिक पार्टियां क्रिमिनल बैकग्राउंड वाले शख्स को चुनावी टिकट देती हैं, तो पार्टियां इसकी वजह भी बताएंगी. राजनीतिक दलों को ये बताना होगा कि आखिर वह क्यों किसी बेदाग प्रत्याशी को चुनाव का टिकट नहीं दे पाई?'

 

Supreme Court also directs political parties to publish credentials, achievements and criminal antecedents of candidates on newspaper, social media platforms and on their website while giving a reason for selection of candidate with criminal antecedents. https://t.co/HE0Om38zGn


— ANI (@ANI) February 13, 2020

दागियों की योग्यता के बारे में 72 घंटे के अंदर EC को बताना जरूरी

अदालत ने पार्टियों को ये भी आदेश दिया कि पार्टी अगर किसी दागी को टिकट देती है, तो उसकी योग्यता, उपलब्धियों और मेरिट की जानकारी 72 घंटे के भीतर चुनाव आयोग को देनी होगी. कोई पार्टी अगर इन दिशा-निर्देशों का पालन नहीं करती है तो उसके खिलाफ चुनाव आयोग कानून के तहत कार्रवाई करेगा.

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने राजनीति के अपराधीकरण को खत्म करने के लिए चुनाव आयोग को एक हफ्ते में फ्रेमवर्क तैयार करने का निर्देश दिया था. जस्टिस आर एफ नरीमन और जस्टिस रवींद्र भट की बेंच ने आयोग से कहा था, 'राजनीति में अपराध के वर्चस्व को खत्म करने के लिए एक फ्रेमवर्क तैयार किया जाए.'

क्या कहता है कानून?
जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा आठ दोषी नेताओं को चुनाव लड़ने से रोकती है, लेकिन ऐसे नेता जिन पर सिर्फ मुकदमा चल रहा है, वे चुनाव लड़ने के लिए स्वतंत्र हैं. भले ही उनके ऊपर लगा आरोप कितना भी गंभीर हो.

जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा आठ (3) में प्रावधान है कि उपर्युक्त अपराधों के अलावा किसी भी अन्य अपराध के लिए दोषी ठहराए जाने वाले किसी भी विधायिका सदस्य को यदि दो वर्ष से अधिक के कारावास की सजा सुनाई जाती है, तो उसे दोषी ठहराए जाने की तिथि से अयोग्य माना जाएगा. ऐसे व्यक्ति सजा पूरी किये जाने की तारीख से छह वर्ष तक चुनाव नहीं लड़ सकेंगे

रिपोर्ट विपिन कुमार सोनी