सीमा पर यूरिया की ‘तस्करी एक्सप्रेस’! बॉर्डर पर लगातार पकड़ी जा रही खाद, फिर भी नहीं टूट रही सप्लाई चेन—₹400 से ₹500 बोरी तक बिक्री के आरोप

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सीमा पर यूरिया की ‘तस्करी एक्सप्रेस’!
बॉर्डर पर लगातार पकड़ी जा रही खाद, फिर भी नहीं टूट रही सप्लाई चेन—₹400 से ₹500 बोरी तक बिक्री के आरोप

आनंद पब्लिक, महराजगंज

(तहसील प्रभारी मसूद उर्फ शमशेर खान)
महराजगंज/नौतनवा। भारत-नेपाल सीमा पर यूरिया की बरामदगी के मामले लगातार सामने आने के बाद अब खाद की कथित तस्करी को लेकर सवाल और भी गहरे हो गए हैं। जब सीमा पर यूरिया पकड़ी जा रही है तो आखिर यह खाद तस्करों के हाथों तक पहुंच कौन रहा है? स्थानीय स्तर पर खाद की बिक्री और सीमा पार भेजे जाने के कथित नेटवर्क ने जिम्मेदार विभागों की निगरानी व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।
स्थानीय लोगों के अनुसार श्रीरामपुर चौराहा, गंगवलिया चौराहा, गंगवलिया गांव और लुकठहवां घाट क्षेत्र में स्थित कुछ खाद की दुकानों से यूरिया की ऊंचे दामों पर बिक्री किए जाने की शिकायतें हैं। आरोप है कि कई दुकानों पर ₹400 से ₹500 प्रति बोरी तक यूरिया बेची जा रही है। यदि यह आरोप सही है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकारी सब्सिडी वाली खाद किसानों के लिए है या फिर तस्करी के नेटवर्क के लिए?
साइकिल से ई-रिक्शा तक—कैसे चलता है खेल?
स्थानीय स्तर पर लगाए जा रहे आरोपों के मुताबिक यूरिया को साइकिल, मोटरसाइकिल, ई-रिक्शा और टेंपो के जरिए सीमा से सटे गांवों तक पहुंचाया जाता है। इसके बाद कथित तौर पर अलग-अलग रास्तों और गांवों के जरिए रात के अंधेरे में सीमा पार कराने की कोशिश की जाती है।
सबसे गंभीर सवाल शेखवानी और आसपास के सीमा मार्गों को लेकर उठ रहे हैं। अगर इन रास्तों से खाद की आवाजाही हो रही है तो क्या जिम्मेदार एजेंसियों को इसकी भनक नहीं लगती? या फिर निगरानी व्यवस्था इतनी कमजोर है कि तस्कर दिन-रात बेखौफ होकर खाद की आवाजाही कर रहे हैं?
सीमा पर पकड़ी जाती है खाद, लेकिन ‘स्रोत’ तक क्यों नहीं पहुंचती जांच?
सीमा पर यूरिया की खेप पकड़े जाने के बाद कार्रवाई तो होती है, लेकिन असली सवाल वहीं खड़ा रह जाता है—यह खाद आई कहां से? किस दुकान से निकली? किसने बेची? किसके स्टॉक से कम हुई?
यदि किसी बरामद खेप का स्रोत किसी अधिकृत उर्वरक विक्रेता तक पहुंचता है तो उसके स्टॉक रजिस्टर, बिक्री रजिस्टर, पॉस मशीन के रिकॉर्ड और वास्तविक स्टॉक का मिलान क्यों न किया जाए?
किसानों को खाद के लिए भटकना पड़े और तस्करों को बोरी-बोरी माल?
एक तरफ किसान यूरिया के लिए परेशान होने की शिकायत करते हैं, वहीं दूसरी तरफ सीमा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खाद की कथित अवैध आवाजाही की खबरें सामने आ रही हैं। इससे सरकारी खाद वितरण व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
अब निगाहें कृषि विभाग, प्रशासन, पुलिस और सीमा सुरक्षा एजेंसियों पर हैं। जरूरत केवल सीमा पर एक-दो बोरी यूरिया पकड़ने की नहीं, बल्कि कथित नेटवर्क की सप्लाई चेन की जड़ तक पहुंचने की है।
सवाल सीधा है—बॉर्डर पर यूरिया आखिर बार-बार पकड़ी क्यों जा रही है?
अगर तस्करी हो रही है तो माल देने वाला कौन, पहुंचाने वाला कौन और संरक्षण देने वाला कौन?
इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा।

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